सावरकर ने माफ़ीनामों में क्या-क्या लिखा, छूटने पर क्या-क्या किया?
हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इस बयान से राजनीतिक खलबली मच गई कि सावरकर को साज़िश के तहत बदनाम किया गया है, उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने दया याचिकाएं महात्मा गाँधी के कहने पर दायर की थीं.
बात सिर्फ़ सावरकर के दया याचिका लिखने और 50 साल की सज़ा मिलने के बावजूद काला पानी से 10 साल में ही रिहा हो जाने तक सीमित नहीं है.
सावरकर पर ये आरोप लगता रहा है कि रिहा होने के बाद उन्होंने औपनिवेशिक शासन की नीतियों का समर्थन किया और भारत के स्वतंत्रता संग्राम से खुद को दूर रखा. उनके आलोचक ये भी कहते हैं कि सावरकर ब्रितानी सरकार से हर महीने 60 रूपए की पेंशन भी लेते थे.
'दया नहीं, समर्पण याचिका'
शम्सुल इस्लाम दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ा चुके हैं और 'सावरकर-हिन्दुत्व: मिथक और सच' नाम की किताब के लेखक हैं. इसी किताब के अंग्रेज़ी संस्करण का नाम है 'सावरकर अनमास्क्ड'.
सावरकर के प्रशंसक अक्सर कहते हैं कि "उन्होंने जेल में मरने की जगह राष्ट्रसेवा करने का रास्ता चुना इसीलिए माफ़ीनामे की चाल चली".
लेकिन शम्सुल इस्लाम कहते हैं, "सावरकर ने अपनी रिहाई के बाद का सारा समय महात्मा गाँधी के खिलाफ माहौल बनाने में बिताया. 1937 में पूरी तरह रिहा होने से लेकर 1966 में अपनी मृत्यु तक सावरकर ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे राष्ट्रसेवा कहा जा सके."
उनका मानना है कि सावरकर ने "दया याचिकाएं नहीं बल्कि आत्म-समर्पण याचिकाएं दायर की थीं" जो उन दया याचिकाओं से बहुत अलग थीं जो कुछ और कैदियों ने दायर कीं जिनमें उन्होंने कैदियों के ऊपर हो रहे ज़ुल्म के बारे में लिखा. जेल में सावरकर किसी भूख हड़ताल में शामिल नहीं हुए क्योंकि ऐसा करने पर सज़ा के तौर पर उनको मिलने वाली चिवट्ठियाँ बंद हो जातीं."
इस्लाम कहते हैं, "सावरकर ने अपनी याचिकाओं में लिखा कि मैंने अतीत में बहुत गलती की और मैंने अपने शानदार भविष्य को तबाह कर दिया. वे ये भी लिखते हैं कि ब्रितानी सरकार अच्छा काम कर रही और मैं उसके साथ खड़ा हूँ. साथ ही, वो यह भी लिखते हैं कि अगर आप मुझे माफ़ कर देंगे तो जो क्रन्तिकारी मुझे आदर्श बनाकर लड़ाई लड़ रहे हैं वो सब हथियार डाल देंगे."
शम्सुल इस्लाम कहते हैं कि उनकी दया याचिकाओं को पढ़कर ये साफ़ हो जाता है कि "उन्होंने अंग्रेज़ों से कहा कि आप जिस तरह से चाहें मेरा इस्तेमाल करें".
वे कहते हैं, "1923 में उन्होंने अपनी किताब में 'भारत हिन्दू राष्ट्र है' लिखकर सीधे तौर पर अंग्रेज़ों की मदद करना तय किया. उन्हें 50 साल काला पानी की सजा हुई लेकिन वो वहां 10 साल ही रहे. अंग्रेज़ों ने उन्हें हिन्दू महासभा को संगठित करने का अधिकार दिया और उनकी पेंशन तय की."
इस्लाम बताते हैं कि "सावरकर ने इंग्लैंड की रानी को लिखा था कि आप हिंदुस्तान को नेपाल के राजा को दे दें क्योंकि नेपाल का राजा सारी दुनिया के हिन्दुओं का राजा है".
वे कहते हैं कि हिन्दू महासभा का सेशन नेपाल के राजा को सलामी देकर शुरू होता था और उनकी लम्बी आयु की कामना पर ख़त्म होता था.
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