वरुण गांधी और मेनका गांधी बीजेपी में हाशिए पर क्यों हैं?
"भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी है. बीजेपी के जितने चुने हुए प्रतिनिधि हैं वे जनता के सुख के लिए, सरकारी योजनाओं को जनता तक पहँचाने के लिए जी-जान से जुटे रहते हैं. ये एक दिन में नहीं हुआ है. ये एक लंबी त्याग और तपस्या का परिणाम है."
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2019 में एक साक्षात्कार के दौरान यह बयान दिया था.
बीजेपी अक्सर कांग्रेस पर 'परिवार-विशेष की पार्टी' होने का आरोप लगाती है और ख़ुद को लोकतांत्रिक पार्टी बताती है.
लेकिन पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में वरुण गांधी और उनकी माँ मेनका गांधी को शामिल नहीं करने के कारण बीजेपी पर सवाल उठ रहे हैं.
वरुण गांधी किसानों के प्रदर्शन को लेकर कई बार अपना असंतोष ज़ाहिर कर चुके हैं. और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा के एक दिन पहले भी उन्होंने लखीमपुर खीरी की घटना के संदर्भ में सरकार की मंशा पर सवाल उठाए थे.
केवल वरुण गांधी और मेनका गांधी को ही नहीं बल्कि सुब्रमण्यम स्वामी, विनय कटियार जैसे कई ऐसे बड़े नेताओं को भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर रखा गया है.
सुब्रमण्यम स्वामी ने तो इस घोषणा के बाद अपने ट्विटर-बायो से पार्टी का नाम भी हटा दिया है.
पार्टी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कई नए चेहरों को समिति में शामिल किया है.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी में शामिल हुए अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती को पार्टी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी है. इसके अलावा दिनेश त्रिवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज को भी पार्टी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के तौर पर चुना है.
क्यों हटाए गए वरुण गांधी?
बीजेपी के मीडिया संपर्क अधिकारी सुदेश वर्मा ने बीबीसी को बताया कि बीजेपी अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी या किसी भी पद के लिए लोगों का चुनाव कई बिंदुओं को ध्यान में रखकर करती है.
वह कहते हैं, "जब सदस्यों का चुनाव किया जाता है तो सारे बिंदुओं को देखा जाता है. सारे रिप्रजेंटेशन मिले हैं या नहीं, बीजेपी के हित में उनका योगदान कितना है, सोशल-ग्रुपिंग जैसे तमाम पक्षों को देखा जाता है. इसके साथ ही ऐसे लोगों का चुनाव किया जाता है जो पूरे देश में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर सकें."
वरुण गांधी और मेनका गांधी को समिति में शामिल नहीं करने के सवाल पर सुदेश वर्मा कहते हैं कि अगर किसी का नाम सूची में नहीं है तो उसे इस तरह से देखना चाहिए कि अगर पुराने नाम ही रहेंगे, तो नए लोगों को जगह कैसे मिलेगी.
वो कहते हैं, "पुराने लोग छोड़ेंगे तभी नए लोगों को जगह मिलेगी और यह महज़ प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन जो नाम नहीं हैं, ऐसा नहीं कि वे अब पार्टी में ही नहीं हैं. कार्यकारिणी के सदस्यों का चुनाव एक लंबी प्रक्रिया के तहत होता है ना कि एक दिन में. रही बात वरुण गांधी से जुड़े सवाल की, तो भारतीय जनता पार्टी में ऐसा नहीं होता है. वरुण गांधी जी ने क्या किया, क्या नहीं... ये उसका असर तो बिल्कुल नहीं है. बीजेपी में हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है. उन्होंने व्यक्तिगत राय दी है. पार्टी की यह राय नहीं है."
लेकिन वरुण गांधी लखीमपुर खीरी हादसे से पहले भी केंद्र और राज्य सरकार पर निशाना साधते रहे हैं.
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