सरकारी बैंकों के डूबे हुए कर्ज़ों की वसूली ये 'बैड बैंक' कैसे कर पाएंगे?
डेढ़ लाख से अधिक शाखाओं में दो खरब डॉलर मूल्य के डिपॉज़िट और अरबों उपभोक्ताओं को अपनी सेवाएं दे रहे भारतीय बैंकों की स्थिति कागज़ों पर मज़बूत दिखती है. लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है.
सालों तक कई बैंकों ने अविवेकपूर्ण तरीके से ऐसे प्रोजेक्ट्स को कर्ज़ दिया है जो अब बेकार पड़ी हैं. ये कर्ज़ अब बढ़ कर अरबों डॉलर का हो चुका है, बैंक इस डूब गए कर्ज़ के कारण परेशान हैं. भरपाई न हो सकने वाले कर्ज़ में से साठ फीसदी सरकारी बैंकों ने दिए थे.
साल 2018 में सरकार ने ऐसे पांच बैंकों को डूबने से बचाया था. बैंकों के कर्ज़ की भरपाई के मामले में परंपरागत रूप से ये कम ही रही है, दिए गए कर्ज़ का केवल एक तिहाई ही वसूल हो पाता है.
कमर्शियल बैंको को बचाने के लिए
कोरोना महामारी के बाद कर्ज़ लेने वालों की स्थिति बिगड़ी है और इस बात की संभावना बढ़ गई है कि वो बैंक का पैसा लौटा सकें. ऐसे में आने वाले महीनों में बैंकों पर कर्ज़ का बोझ बढ़ने की पूरी संभावना है.
साल 2005 से 2009 के बीच सरकार ने टैक्सपैयर्स का 35 अरब डॉलर इन बैंकों की हालत बेहतर करने में लगाया, लेकिन इससे कुछ असर नहीं पड़ा.अब सरकार 27 अरब डॉलर के कर्ज़ के घाटे के कारण पैदा हुए दबाव से कमर्शियल बैंको को बचाने के लिए 'बैड बैंक' का सहारा लेने जा रही है. एक अनुमान के अनुसार ये कमर्शियल बैंकों के दिए सौ अरब के कर्ज़े का एक चौथाई होगा.
इस कारण कर्ज़ देने को लेकर बैंकों पर दबाव तो पड़ा ही है, बल्कि इससे विकास की गति भी धीमी हो गई है. अर्थव्यवस्था में निजी निवेश लगातार कम हो रहा है और जिन बैंकों पर दबाव अधिक है वो अब हड़बड़ी में कर्ज नहीं देना चाहते.
'बैड बैंक' क्या होते हैं?
'बैड बैंक' संपत्ति के पुनर्निमाण के लिए बनी कंपनी होती है जो बैंकों से एक तय कीमत पर कर्ज़ खरीद लेती है. इसके बाद वो कर्ज़ लेने के लिए दी गई गारंटी बेचती है, या फिर दिवालिया हुई कंपनी की संपत्ति बेचती है.
इन्हें बेचने से जो पैसा मिलता है उससे कुछ हद तक बैंकों के कर्ज़ की वसूली हो जाती है. ये पहली बार नहीं है जब भारत बैंक डूबे कर्ज़ की मुश्किल से परेशान हैं और उन्हें 'बैड बैंक' की ज़रूरत पड़ी है.
दरअसल, बीते दो दशकों में इस तरह की निजी 28 कंपनियां बनी हैं लेकिन कर्ज़ वसूली के मामले में स्थिति बेहतर नहीं हुई है. इस बार सरकार ने इस काम के लिए दो कंपनियां बनाई हैं- एक कंपनी बैंक का डूबा हुआ कर्ज़ खरीदेगी और ये सरकारी कंपनी होगी.
दूसरी कंपनी आंशिक रूप से निजी होगी और वो कर्ज़ लेने वाले की संपत्ति बेचने की कोशिश करेगी. कमर्शियल बैंकों द्वारा संपत्ति के अपेक्षित मूल्य और संपत्ति बेच कर मिले कुल पैसे के बीच जो फर्क रहेगा वो सरकार चुकाएगी.
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