अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान के लिए कैसे 'लाइफ़लाइन' बने तुर्की और क़तर
अमेरिका की आख़िरी फ़्लाइट काबुल हवाई अड्डे से उड़ते ही तालिबान के लड़ाकों ने जश्न में ख़ूब फ़ायरिंग की. लेकिन अकेले हथियारों के दम से दुनिया में अलग-थलग पड़े तालिबान लाखों अफ़ग़ानों को अनिश्चित भविष्य से बाहर नहीं निकाल पाएगा.
सारी दुनिया तालिबान की वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अपना दबाव बनाने की तैयारी कर रही है. लेकिन इन सबके बीच दो मुस्लिम देश, मध्यस्थ और सूत्रधार के रूप में उभर रहे हैं. ये देश हैं - क़तर और तुर्की.
दोनों हाल के वर्षों में तालिबान से हुई नज़दीकी का फायदा उठा रहे हैं. दोनों को अफ़ग़ानिस्तान में अवसर दिख रहे हैं. लेकिन दोनों एक जुआ भी खेल रहे हैं. एक ऐसा जुआ जो मध्य पूर्व में पुरानी प्रतिद्वंद्विता को और भी हवा दे सकता है.
गैस के समृद्ध भंडार वाले छोटे से खाड़ी देश क़तर के अधिकारियों ने अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकल रहे कई लोगों को जीवनदान दिया है.
वे आगे कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान, क़तर के लिए एक महत्वपूर्ण जीत होगी. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उसने दिखा दिया है को वो तालिबान के साथ मध्यस्थता करने में सक्षम हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि अब क़तर, पश्चिमी देशों की नज़र में खाड़ी में एक गंभीर खिलाड़ी बनता जा रहा है."
जैसे-जैसे पश्चिमी देश काबुल से भागे, क़तर के अधिकारियों का राजनयिक मूल्य बढ़ता गया. क़तर के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता लोलवाह अलखटर के ट्विटर फ़ीड को दुनिया की बड़ी ताक़तों की ओर से ताबड़तोड़ रिट्वीट मिले.
डीना ने इस महीने की शुरुआत में लिखा था, "क़तर... इस संघर्ष में एक विश्वसनीय मध्यस्थ बना हुआ है."
लेकिन तालिबान से दोस्ती के ये पुल भविष्य के लिए जोखिम हो सकते हैं, जिसमें मध्य पूर्व की पुरानी रंजीशें एक बार फिर सिर उठा सकती हैं.
तुर्की और क़तर इस क्षेत्र के इस्लामी आंदोलनों के क़रीब हैं. इसकी वजह से अक्सर मिस्र, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ तनाव पैदा होता रहता हैं. ये देश इन इस्लामी समूहों को अपने अस्तित्व के लिए ख़तरे के रूप में देखते हैं.
अगर ये दो देश दक्षिण एशिया में तालिबान के साथ डिप्लोमेसी में दुनिया की मदद करते हैं, तो क्या इसका असर मध्य-पूर्व की राजनीति पर भी होगा.
डीना एस्फांदरी का कहना है कि तालिबान का सत्ता में वापस आना, इस्लाम की ओर एक नए सिरे से झुकाव है. ये एक ऐसी विचारधारा है जो इस्लामी क़ानून के अनुसार सरकार और समाज को फिर से संगठित करना चाहती है. लेकिन डीना कहती हैं कि फ़िलहाल ये सोच दक्षिण एशिया तक ही सीमित है.
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