उत्तराखंड में बेमौसम बाढ़ की तबाही उत्तर प्रदेश तक पहुँची
कुमाऊँ के पहाड़ों में अभूतपूर्व बारिश से आया सैलाब तबाही मचाने के बाद घटने लगा है, लेकिन उसके दिए घावों को पहाड़ों के बाशिंदों और पड़ोसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तराई के लोगों के ज़ेहन से उतरने में लम्बा वक़्त लगेगा.
नैनीताल, हल्द्वानी, रामगढ़ और मुक्तेश्वर के सब्ज़ी उगाने वाले किसानों पर क़हर बरपाती बाढ़ ने पड़ोसी सूबे उत्तर प्रदेश के नौ ज़िलों को भी चपेट में ले लिया है.
सैकड़ों गाँव डूब गए हैं. कटाई का इंतज़ार कर रही धान की फ़सल बर्बाद हो गई है. गन्ने की बोआई अब समय पर नहीं हो सकेगी.
60 से ज़्यादा लोगों की जान लेने के साथ ही बाढ़ की तबाही ने किसानों के ख़्वाबों की भी लील लिया है. जन-जीवन पर सैलाब ने क्या असर डाला है, इस पर बीबीसी सहयोगी पत्रकारों की रिपोर्ट:-
देहरादून से रोहित जोशी
'अब तक बरसात या ओलों से फ़सलें तबाह होती थीं, इस बार खेत ही तबाह हो गए. सब बह गया.' बाढ़ की चपेट में आए तल्ला रामगढ़ के विजय सिंह मायूसी भरी आवाज़ में अपना दुख बयान करते हैं.
भारी बरसात और बाढ़ ने नैनीताल ज़िले में फलों और साग-सब्ज़ी के लिए मशहूर रामगढ़ और मुक्तेश्वर बेल्ट को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है.
ख़ू़बसूरत हिमालय को ताकते ऊँचे पहाड़ों की चोटियों पर सीढ़ीदार खेतों में सेब, आड़ू, ख़ुबानी, आलू, मटर, टमाटर, अन्य दूसरी सब्ज़ियों और फ़सलों के कई बगीचे और खेत, तेज़ बरसात, बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में आ कर तबाह हो गए हैं.
लॉकडाउन के बाद अपनी नौकरी छोड़ रामगढ़ में अपने पुश्तैनी खेतों की ओर लौटे किसान पृथ्वी सिंह के लिए यह बारिश तबाही लेकर आई है.
उनके खेतों के पास से बहती एक छोटी नदी में आए उफान ने मछलियों के लिए बनाए उनके एक टैंक को नुक़सान पहुँचाया और उनके खेत और घर का रास्ता तक भूस्खलन की चपेट में आ गया.
उनके पड़ोस का एक मकान पूरी तरह ज़मींदोज़ हो गया जिसमें दो लोगों की मौत हुई. पृथ्वी बिलखते हुए बताते हैं, ''मैं बाढ़ से घिरा था और बस सौ मीटर दूर भी न जा पाया मदद करने.''
और फिर वो ग़ुस्से में प्रशासन के बचाव प्रयासों की 'संवेदनहीनता' पर सवाल उठाने लगते हैं, 'ये प्रभावितों को ख़स्ताहाल स्कूल में ठहरा रहे हैं जबकि सरकारी टूरिस्ट गेस्ट हाउस ख़ाली पड़े हैं.''
''एक दलित आदमी का पूरा मकान दब गया है. पाँच लोग थे, मेहनत करते थे. उनकी ज़मीन बह गई. उनके पास खाने को राशन नहीं है, कपड़े नहीं हैं. वो ख़स्ताहाल स्कूल में कैसे रहेंगे?''
ब्रिटिश दौर से ही व्यावसायिक तौर पर फलों और सब्ज़ी की खेती करने वाले नैनीताल ज़िले के इस इलाक़े में उत्तराखंड के सुदूर गाँवों की तुलना में पलायन कम है. नैनीताल, हल्द्वानी और भवाली जैसी मंडियों में अपनी फ़सल बेचने वाले इन काश्तकारों के सामने इस तबाही ने अनिश्चितता के हालात पैदा कर दिए हैं.
सूपी गाँव के बची सिंह बिष्ट कहते हैं, ''इस समय हमारे खेतों में बीन्स, गोभी, हरी सब्ज़ियां, मड़ुआ और दालों की फ़सल है. लेकिन सब कुछ तबाह हो गया है. सैकड़ों खेत बह गए हैं. फ़सल पूरी तरह बर्बाद हो गई है.''
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