उत्तराखंड की नैनी झील कैसे तबाही की झील में तब्दील हुई
उत्तराखंड में हुई रिकॉर्ड तोड़ बारिश ने ख़ासतौर पर कुमाऊँ क्षेत्र में तबाही मचा दी है. बारिश का सबसे ज़्यादा असर तालों के लिए मशहूर और टूरिस्ट स्पॉट नैनीताल पर दिखा है.
कोसी, गौला, रामगंगा, महाकाली के साथ ही इलाक़े की सभी नदियां और जल धाराएँ उफ़ान पर हैं और सैकड़ों भूस्खलनों के चलते कई मकान ज़मींदोज़ हो गए हैं और अधिकतर सड़कें बाधित हैं.
कुमाऊँ के डीआईजी नीलेश भरणे ने बीबीसी को बताया है, "अब तक 46 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है और दूरस्थ इलाक़ों में रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है."
ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि हताहतों की संख्या बढ़ सकती है. उन्होंने बताया, ''अलग-अलग इलाक़ों में ऑपरेशन चल रहा है. जिन इलाक़ों में गाड़ियों के जा सकने की स्थिति नहीं है फ़ोर्स पैदल वहाँ पहुंची है. आपदा का केंद्र नैनीताल ज़िले के मुक्तेश्वर और रामगढ़ के इलाक़ों में रहा है.''
मंगलवार को नैनीताल की ओर जाने वाली सारी ही सड़कें कई जगह मलबा आने से बाधित हो गई थीं लेकिन डीआईजी भरणे ने बताया कि सभी सड़कों को खोल दिया गया है और अब ट्रैफ़िक सुचारु हो गया है.
124 सालों में सबसे ज़्यादा हुई बारिश
मौसम विज्ञान केंद्र, उत्तराखंड की ओर से दर्ज आँकड़ों के मुताबिक यह उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में बीते 124 सालों में अब तक हुई सबसे ज़्यादा बारिश है.
मौसम विज्ञान केंद्र, उत्तराखंड के डायरेक्टर बिक्रम सिंह ने बताया, ''1897 में नैनीताल ज़िले के मुक्तेश्वर में पहली बार मौसम केंद्र स्थापित किया गया था. तब से अब तक दर्ज आँकड़ों के मुताबिक कुमाऊँ में सबसे अधिक 254.5 एमएम बारिश 18 सितंबर 1914 में हुई थी और 24 घंटों में मुक्तेश्वर मौसम केंद्र ने 340.8 एमएम बारिश दर्ज की गई है.''
इसी तरह कुमाऊँ के मैदानी इलाक़ों में भी बारिश का रिकॉर्ड टूटा है और पंतनगर मौसम विज्ञान केंद्र में 24 घंटों में 403.2 एमएम बारिश दर्ज की गई है. जबकि अब तक दर्ज आँकड़ों में 10 जुलाई 1990 को सबसे अधिक बारिश 228 एमएम दर्ज की गई थी.
बिक्रम सिंह ने बताया कि बंगाल की खाड़ी से उठने वाली नम हवाओं को पश्चिमी विक्षोभ ने 75 अंश पूर्व की ओर आकर रोक दिया जिससे नम हवाएं ऊपर की ओर उठने से यह भारी बरसात हुई.
मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक उसके हर एक केंद्र में भारी से अत्यंत भारी (हैवी टू एक्स्ट्रीमली हैवी) रेनफ़ॉल दर्ज हुआ है जो कि एक अभूतपूर्व स्थिति है. हालांकि अब यह स्थिति टल गई है और अब मौसम सामान्य हो जाएगा.
नैनी झील हुई ओवरफ़्लो
वहीं भारी बरसात के बीच नैनीताल की मशहूर नैनी झील के ओवरफ़्लो हो जाने से मल्लीताल में नैनादेवी मंदिर परिसर, मॉल रोड, और तल्लीताल के नया बाज़ार इलाक़े में बाढ़ आ गई और कई दुकानों और घरों में पानी भर गया.
तल्लीताल निवासी राजीव लोचन साह ने बताया, ''चारों ओर पानी से घिरे हम जैसे किसी टापू में हैं. हर तरफ़ ख़ौफनाक मंज़र है. हमने पूरी रात ऐसे ही डर में गुज़ारी है.''
तल्लीताल कृष्णापुर में रहने वाली प्रियंका बिष्ट कहती हैं, ''मैंने अपनी ज़िंदगी में नैनी झील को ऐसे बाढ़ की तरह ओवरफ़्लो होते कभी नहीं देखा. झील से इतना पानी बह रहा है कि नया बाज़ार और भवाली रोड में दुकानों और लोगों के घरों में पानी भर गया है. लोगों का बहुत नुकसान हुआ है.''
नैनीताल शहर में रहने वाले पर्यावरणविद् और इतिहासकार शेखर पाठक कहते हैं, ''इतिहास में भी नैनीताल के पास इस तरह की एक्सट्रीम प्राकृतिक परिस्थितियाँ बनीं हैं. 1920-21 में भी इसी तरह की भारी बारिश हुई थी और उससे पहले 1880 में सितम्बर की 14 से लेकर 18 तारीख में भारी बरसात के बाद नैनी झील के ऊपरी छोर की पहाड़ी पर एक बड़ा भूस्खलन आया था. जिसकी चपेट में आकर 155 लोगों की मौत हो गई थी. इस बार की भारी बरसात और बाढ़ ने यहाँ भय का माहौल पैदा कर दिया है.''
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