कोरोना: क्या भारत में स्वस्थ बच्चों के लिए वैक्सीन का इंतज़ार ख़त्म?
क्या आप भी उन लोगों में से हैं, जो बच्चों की वैक्सीन को उनके स्कूल जाने से जोड़ कर अब तक देख रहे थे.
वैसे तो वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के मुताबिक़ स्कूलों में बच्चों के जाने और उनके लिए वैक्सीन की उपलब्धता दोनों ही अलग-अलग बातें है, जिनका आपस में कोई लेना देना नहीं है.
लेकिन अगर आप भी ऐसे अभिभावकों में हैं, तो बच्चों की वैक्सीन से जुड़ी ये ख़बर आपके लिए है.
2-18 साल के बच्चों के टीकाकरण के लिए कोवैक्सीन को सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी की तरफ़ से हरी झंडी मिल गई है. कौवैक्सीन बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक के मुताबिक़ उन्होंने ट्रायल का जो डेटा कमेटी के सामने पेश किया था, उस पर कमेटी ने सकारात्मक सुझाव दिए हैं.
अब इस टीके को भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीजीसीआई) की मंज़ूरी का इंतज़ार है. इससे अनुमति मिलने के बाद भारत में बच्चों के लिए इस वैक्सीन का इस्तेमाल किया जा सकेगा.
भारत बायोटेक की कोवैक्सीन से पहले ज़ायडस कैडिला की वैक्सीन ज़ायकोव-डी को बच्चों पर इस्तेमाल की मंज़ूरी मिली है. इसी साल अक्तूबर के मध्य से बच्चों के लिए बाज़ार में आ सकती है.
इस वजह से अटकलें लगाईं जा रही हैं कि बच्चों को वैक्सीन लगाने से बस एक क़दम दूर है भारत.
तो क्या एक महीने के अंदर ही क्या हर स्वस्थ बच्चे को कोरोना वैक्सीन लग सकेगी?
बच्चों के लिए वैक्सीन की उपलब्धता?
मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की हेड और केंद्र सरकार के कोविड-19 टास्क फ़ोर्स की सदस्य डॉक्टर सुनीला गर्ग का कहना है कि भारत में जल्द ही 97 करोड़ वैक्सीन के डोज़ पूरे कर लिए जाएँगे, जिनमें से मात्र 11 करोड़ वैक्सीन की डोज़ ही कोवैक्सीन की है. यानी पिछले 10 महीने में 11 करोड़ डोज़.
यहाँ ग़ौर करने वाली वाली बात ये है कि जो कोवैक्सीन भारत में वयस्कों को लग रही है, वही कोवैक्सीन बच्चों को लगनी है. बस बच्चों में उसके असर के लिए ट्रायल अलग किया गया है.
केंद्र सरकार के अनुमान के मुताबिक़ भारत में 18 साल से कम उम्र के 42-44 करोड़ बच्चे हैं. अगर सभी को वैक्सीन की दो डोज़ लगनी है, तो कुल 84-88 करोड़ वैक्सीन की डोज़ की ज़रूरत पड़ेगी, जिनमें से ज़ायडस कैडिला की वैक्सीन ज़ायकोव-डी की 5 करोड़ डोज़ साल के अंत तक मिलने का अनुमान है.
इसके अलावा बच्चों पर इस्तेमाल होने वाली दो और वैक्सीन को मंज़ूरी अभी मिलना बाक़ी है.
स्पष्ट है कि बच्चों के लिए टीकाकरण शुरू करने से पहले केंद्र सरकार को बच्चों की वैक्सीन की भारत में उपलब्धता पर ध्यान देना होगा.
इस वजह से चर्चा है कि बच्चों में भी चरणबद्ध तरीक़े से वैक्सीन को मंज़ूरी दी जाएगी.
नेशनल टेक्निकल एडवायज़री ग्रुप ऑन इम्यूनाइज़ेशन इन इंडिया (एनटीएजीआई) के प्रमुख डॉक्टर एनके अरोड़ा के मुताबिक़, "कुछ बच्चों को डायबटीज़, किडनी, हार्ट या दूसरी बीमारी होती है. उन्हें टीकाकरण अभियान में प्रथामिकता देने की ज़रूरत होगी. ऐसे बच्चों की संख्या भारत में 6-7 करोड़ की है. ऐसे बच्चों में स्वस्थ बच्चों के मुकाबले गंभीर इन्फ़ेक्शन का ख़तरा 3-7 गुना ज़्यादा होता है. उन्हें वयस्कों के साथ टीकाकरण की आवश्यकता होगी. वयस्कों और को-मॉर्बिड बच्चों को टीका लगने के बाद ही स्वस्थ बच्चों का नंबर आएगा."
स्वस्थ बच्चों को भी लगेगी वैक्सीन?
माना जा रहा है कि कोवैक्सीन को बच्चों में इस्तेमाल के लिए कमेटी ने कुछ सुझाव भी दिए हैं, जैसे वैक्सीन लगने के शुरुआती दो महीने तक हर 15 दिन का डेटा कमेटी को भेजना होगा. ट्रायल आगे भी चलते रहने चाहिए. साथ ही कंपनी को एक रिस्क मैनेजमेंट प्लान भी तैयार करना चाहिए.
इस वजह से भारत सहित दुनियाभर में इस पर बहस चल रही है कि क्या स्वस्थ बच्चों को वैक्सीन लगनी चाहिए?
डॉक्टर सुनीला गर्ग कहती हैं, "कोरोना से बचाव में अभी प्रथामिकता वयस्कों और युवाओं को दिए जाने की ज़रूरत है. उसके बाद 12 से 18 साल की उम्र में को-मॉर्बिड वालों का नंबर आना चाहिए."
कई जगहों में हुए सीरो सर्वे में पाया गया है कि 60 फ़ीसदी बच्चों में एंटीबॉडी पाई गई है. मतलब ये कि वो बीमार भी हुए और ठीक भी हो गए.
इस वजह से अगर 1000 बच्चे एक स्कूल में हैं और उसमें से 100 बच्चों को कोविड हो भी गया, तो डरने की ज़रूरत नहीं है.
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